जनवरी 05, 2010
गैंग रेप के मुल्जिम या मुजरिम ?
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल...झीलों की नगरी के नाम से मशहूर है...और यहां का वातावरण बहुत ही ख़ूबसूरत है...यहां कई राज्यों से छात्र-छात्राएं पढ़ने या रिसर्च करने आते हैं...और भोपाल की आमोहवा में रचबस जाते हैं...कुछ स्टूडेंट्स ऐसे भी हैं...जो अपने मां-बाप के सपनों को साकार करने में लगे हैं...तो कुछ लोग ऐसे भी हैं...जो सिर्फ़ अपनी ज़िदगी ख़ुद जीना चाहते हैं...और वे अपनी निजी ज़िंदगी में किसी का भी दख़ल बर्दाश्त नहीं करते...चाहे वे उनके माता-पिता ही क्यों ना हों...आज जब ख़बर मिली...कि झीलों की नगरी में किसी लड़की से सामूहिक बलात्कार हुआ है...तो इस घटना ने मेरे दिल को झझकोर दिया...लेकिन इसमें दूसरा पहलू ये है...कि बलात्कार होता क्यों है ? इसके पीछे कौन सी मानसिकता काम करती है ? जहां तक मेरा सोचना है...कि लोग अपनी हवस मिटाने के लिए किसी भी तरह लड़कियों को बहला-फुसलाकर उनसे ज़्यादती करते हैं...लेकिन इसके पीछे कुछ लड़कियां भी ज़िम्मेदार होती हैं...कारण, जो भी हो...चाहे समाज में वे भी रसूख़ों की श्रेणी में शामिल होना चाहतीं हों...या फिर ग्लोबलाइजेशन के दौर में वे ख़ुदको मॉडर्न साबित करना चाहती हों...भोपाल में हुआ सामूहिक बलात्कार कुछ चीज़ों को सोचने पर मज़बूर कर देता है...किसी भी स्टूडेंट्स को अपनी हॉस्टल से बिना अनुमति के बाहर नहीं जाना चाहिए...अगर जाना ज़रूरी है...तो अपने माता-पिता या लोकल गार्जियन को तुरंत सूचित करना चाहिए...हालांकि ये बातें तो फैशन से परे हैं...अपने मां-बाप से दूर रह रहे...कुछ स्टूडेंट्स उनकी ख़ामोशी का फ़ायदा उठाते हैं...और देर रात तक क्लबों और पार्टियों में नाचते रहते हैं...ये कोई बुराई नहीं है...लेकिन कुछ स्टूडेट्स ने तो हद कर दी...वे अपनी वॉर्डन मैम को लोकल गार्जियन का हवाला देकर हॉस्टल से बाहर अपने ब्वॉय फ्रैंड या आशिक के साथ रात गुज़ारने को आम बात समझतीं हैं...जिसका ख़मियाज़ा उन्हें भुगतना पड़ता है...बलात्कार या 'सामूहिक बलात्कार' से...ये कोई नई बात नहीं है...ये मेरे अपने विचार हैं...कि किसी भी लड़की को पहले अपने माता-पिता से अनुमति लेनी चाहिए...उसके बाद ही कोई क़दम उठाना चाहिए...ताकि आप कोई ग़लती ना कर सकें...और आप हमेशा ख़ुश रहें...और अपने मां-बाप के सपनों को साकार कर सकें...
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ (Atom)
